ॐ

Kripadan

(1)

कृपा दान देना दया। गुण गान करूं सेवा।।

कभी भूल न जाऊं। मन में ध्यान करूं सदा।।

नहीं चाहूं दु:ख धन। ना मोक्ष मुक्ति की भी दान।।

सत संगति के भी सुख। सर्व सदा रहूं सुख।।

सदा सर्वे जन्मों जन्मों। दास रखो जग जन्मी।।

(2)

करूं क्षमा अपराध। तुम नाथ बड़े सिद्ध।।

नहीं जाने अधिकार। चरण शरण विचर।।

नाथ करे तुम ही सर्व। सभी करो निवारण।।

(3)

भया मेरो रे समागत। देखत देखत चरण।।

दया बिंदु कृपा दान। मन कैसे जनम।।

आओ आओ भगवान। करे पुकार भाव भरा।।

ऐसा कैसा माया भोग। नाथ करे करो निवारण।।




(4)

करूं आरती तुम। अलख निर बानी।।

धन्य धन्य, आज दिन, सुन नाथ सिद्ध बानी।।

देखो देखो हे सिद्ध, भये भक्त भाग्यवंत।।

खड़े रहूं हो नतमस्तक, देखूं सर्व पुण्यवंत।।

कैसे प्रेम भाव भक्ति, गुरु गोरख गुण गाती।।

सदा सर्व सत्य रूप, नित्य करें अवलोकन।।

माया आनंद आनंद, कटे नाथ भाव विलास।।

ज्ञान ज्ञान सतत के साधन, नाथ कहे तो सतत पावत।।


[पुस्तक: ‘श्री नाथ सिद्ध पंथ’]

लेखक: श्री महंत गुरु डॉ. योग विलास नाथ जी महाराज (के सौजन्य से)

अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा

अध्यक्ष-प्रचार प्रसार