कहे नाथ गुरु, बारह पंथ। तीन लोक में, भये व्यापक, नाथ सिद्ध संत॥
नाथ परमपद, अज्ञान ही धर्म। जिसमें अनेक, नाथ कुल की, रीत चली॥
अपने अपने स्थान, पंथ बितावे। नाथ सिद्धों, ऊंच नव से, सिद्ध उजाले॥
कहे नाथ गुरु, यह पंथ पुरातन। चार युग से, चली परंपरा, सिद्ध सनातन॥
सत नाथ ब्रह्मा, शिव के योगी। धन्वंतरि जी, स्थापना थी, कर्म काण्ड भोगी॥
परशुराम जी, राम के जोगी। नेपाल तोरन, स्थापना थी, रोट भण्डार भोगी॥
पागल पंथ नाथ, योगियों जोगी। गोरखनाथ ने, स्थापना थी, अघोर नाथ जोगी॥
पंच पंथ के, जालंधर जोगी। गोर जालंधर से, स्थापना थी, नाम रस भोगी॥
राज युधिष्ठिर, धर्म के पंथ। दुर्गे देवल, स्थापना थी, कारखानी संत॥
कहे नाथ जी, नाथ सिद्धों की ज्योति। जिसमें अनेक, नाथ सिद्ध थे, अध्यात्म के ज्ञानी॥
शेख बकी के, पंथ नाथाजी। दरिया पंथ में, स्थापना थी, सत राम जोगी॥
गोरख बस्ती में, पंथ कपाली। पीर पंथ के, सिद्ध कपाली जी, वीर वीर मुनी॥
हर हर गंगे, पंच गंगाधर। गंगासागर, स्थापना थी, गंगासागर मानी॥
पंथ नटेश्वरी, लक्ष्मण के योगी। गोरख टिल्ला, स्थापना थी, राज काज भोगी॥
पंथ आई के, किन्नवा माँ सिद्ध। तंबू देश में, बिनवा गुफा, स्थान प्रसिद्ध॥
पंथ धेरंग, भर्तहरि योगी। रावल इन्द्र, स्थापना थी, पीर पंथ जोगी॥
रावल पंथ की, सिद्ध परम्परा। बार दरबार, स्थापना थी, पाँच पंथ जानी॥
और पंथ थे, नाथ दरबारी। कच्छ-कच्छ, नौ नाथ, ओडर द्वार करी॥
अटूट पावन, पंथ नाथ जी। तंत्र मंत्र, अटल दोलन, सतगुरु पंथ जी॥
अगोर दरबार के, गुरु भैरवजी। शिव गोरख, शिव गोरख, नाम रस भोगी॥
(पुस्तक: श्री नाथ सिद्ध पाठ)
लेखक श्री महंत गुरु डॉ. योगी विलास नाथ जी महाराज (के सौजन्य से)
अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा
अध्यक्ष, प्रचार प्रसार