गुरु वंदना
॥ॐ॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरु विष्णु: गुरु देवो महेश्वर: ।
गुरु: साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥
ध्यान मूलं गुरुमूर्ति: पूजामूलं गुरुपदम् ।
मंत्र मूलं गुरु वाक्य, मोक्ष मूलं गुरु कृपा ॥
मंत्र सत्य पूजा सत्य, सत्यवच निरंजनम् ।
गुरु वाक्य सदा सत्य, सत्यं एक परंपदम् ॥
सत्य सनातन, परम ईश्वर । सत गुरु नाथ, आनंद सागर ॥
पापर रहन, पूरण मरदता । राखो भाव, भक्ति समता ॥
कृपा करदो, कर दो राखो । इसलिए भाव, स्वरूपी लाग्यो ॥
धर्म कर्म, योग उपदेश । पितृ स्वरूपी, कृपा करदो ॥
जड़ अज्ञान, हम जीवात्मा । ज्ञान चक्षु, प्रगटायो परमात्मा ॥
हृदय तले, ज्ञान से प्रगटायो । अंतर आत्मा, भ्रम को मिटायो ॥
नाम दिया जो, मंत्र अगाध । शिव गोरख योगी, शब्द सिद्ध ॥
भेद योग, चेतन दिखलाया । माया भोग, वैराग्य दिलवाया ॥
शुद्ध अमावसि, शुक्ल पक्षी । मंगल दासी, मंगल दिन साक्षी ॥
देख मनका, शुद्ध भाव । दीनी दीक्षा, किया स्वीकार ॥
दीनी ज्ञान, अपार । भव सागर से, किया पार ॥
करि सतगुरु, यह सत जीवन । गुरु शिष्य, परमात्म मिलन ॥
अगम से आया, निगम को जाना । सत्य कहकर, सत्य को पाना ॥
शब्द स्वरूप, सर्ग शिव । पीयो अमृत, सदगुरु देता ॥
सत्य सतगुरु, सहज हो पाया । परख लिया, भेद बताया ॥
सतत संगति, सतगुरु तार । सतगुरु मेरो, कृपा सागर ॥
सोप दिया जब, जीवन का भार । निश्चित किया, जीवन का सार ॥
हाथ सतगुरु, रहो दयावंता । और कौन दिया, कोई देता ॥
नाद जगे, ज्ञान नाद मृद्गा । भेद भाव, सतगुरु दीक्षा ॥
तुम कारण हम, भये अनंता । लाज राखो, गुरु विधि संतता ॥
लेखक श्री नंद गुरु डॉ. योगी विलास नाथ जी महाराज (के सान्निध्य से)
अखिल भारतीय अवधूत योगी महासभा
अध्यक्ष, प्रचार प्रसार