ॐ

Shri Gorakh Nath Siddh Chalisa

ॐ शिव गोरक्ष योगी

ध्यानम्

ॐ शिव स्वरूप गोरक्षनाथ निरंजनं सिद्धि सिद्धि वर दायकम् ।

महामन्त्रं तन्त्रज्ञान नाथी गुरु आदि नाथम् ॥

जटामुकुटं विभूषं शैलसिंह मस्तकं चन्द्र सुशोभितम् ।

झोली डंडी निमंत्रकला कण्ठधर मुण्डमाला धारयम् ॥

योगी युक्तं रमणीं चन्द्रकला चन्द्रप्रसन्नम् ।

मोक्षदत्तं मम नाथ योगेश्वरं सर्वदा मम हृदय निवासन्तम् ॥

अर्थ


हे गुरु गोरक्षनाथ जी आप निरंजन एवं शिव स्वरूप हैं तथा आप सिद्धि सिद्धियों का वरदान देने वाले हैं।

हे गुरु गोरक्षनाथ जी आप माता पार्वती तथा काल का अवतार हैं।

आप जटाजूट धारण करते हैं तथा सिर पर चन्द्र सुशोभित है।

आप मुण्डमाला धारण करते हैं तथा योगयुक्त समाधि धारण करते हैं।

अतः वह योगेश्वर सदैव मेरे हृदय में निवास करें और मैं योगेश्वर को मेरा आदेश आदेश आदेश।

श्री गुरु गोरक्षनाथ सिद्ध चालीसा
दोहा

गणपति गिरिजा पूत को । समरू बारंबार ॥

हाथ जोड़ विनती करूं । शारदे नाम आधार ॥

जय जय जय गोरक्ष अविनाशी । कृपा करो गुरु देव प्रकाशी ॥

जय जय जय गोरक्ष गुरु ज्ञानी । इच्छित रूप योगी वरदानी ॥

अलख निरंजन तुमको नामा । सदा रहे भक्तन हित कामा ॥

नाम तुम्हारा जो कोई गावे । जनम जनम के दुःख नसावे ॥

जो कोई गोरक्ष नाम सुनावे । भूत पिशाच निकट नहीं आवे ॥

ज्ञान तुम्हारा योग से पावे । रूप तुम्हारा लक्षन जो जानें ॥

निराकार तुम निर्गुणी महिमा । तुम ही करते जगत की सीमा ॥

घट घट के तुम अंतर्यामी । सिद्ध चौरासी करे प्रणामी ॥








भस्म अंग गल नाद विभूष । जटा शिर अति सुंदर साजे ॥

तुम बिन देव और नहीं दूजा । मुनि जन करते पूजा ॥

चिदानंद संत हितकारी । मंगल करण अमंगल हारी ॥

पूर्णब्रह्म सकल घट वासी । गोरक्षनाथ सकल प्रकाशी ॥

गोरख गोरख जो कोई ध्यावे । ब्रह्म रूप के दर्शन पावे ॥

शंकर रूप धरा उर साजे । कानन कुंडल सुंदर साजे ॥

नित्यानंद है नाम तुम्हारा । असुर मार भक्तन रखवारा ॥

अति विशाल है रूप तुम्हारा । सुर नर मुनि जन पावे ना पारा ॥

दीनबंधु दीनन हितकारी । हरौ पाप सब शरण तुम्हारी ॥

युग युग में हो तुमकर तारा । सदा करो सतनाम का द्वारा ॥

प्रातः काल से नाम तुम्हारा । सिद्धि बढ़े और योग पसारा ॥

हठ हठ हठ गोरक्ष हठोले । मार मार देरी के किले ॥

चल चल चल गोरक्ष विकाला । दुश्मन मार करो बेहाला ॥

जय जय जय गोरक्ष अविनाशी । अपने जन की हरो चौरासी ॥

अचल अघम है गोरक्ष योगी । सिद्ध देव हरि रसम भोगी ॥

काटो मार्ग भ्रम की तुम आई । तुम बिन मेरा कौन सहाई ॥

अजर अमर है तुम्हरो देहा । तुम अविनाशी सतत सनेहा ॥

कोटिन जन सम तेरा दुहारा । तुमसे जगत प्रसिद्ध तुम्हारा ॥

योगी रूप तुम्हारी माया । पार ब्रह्म से ध्यान लगाया ॥

ध्यान तुम्हारा जो कोई ध्यावे । अष्ट सिद्धि नव निधि घर पावे ॥

शिव गोरक्ष है नाम तुम्हारा । पापी दुःख अघ को तारा ॥

आगम अगोचर नियम नाथा । सदा रहे संत के साथा ॥

शंकर रूप अवतार तुम्हारा । गोपीचंद भर्तृहरि को तारा ॥

सुन लीजे गुरु अरज हमारी । कृपा सिंधु योगी दयाधारी ॥

पूर्ण आस दास की कीजो । सेवक जान ज्ञान को दीजो ॥

पाप पवन उद्धार अधम को । तव चरणन का अवतार ॥













अलख निरंजन नाम तुम्हारा । अगम पंथ जिने को धारा ॥

जय जय जय गोरक्ष भगवान । सदा करो भक्तन कल्याण ॥

जय जय जय गोरक्ष अविनाशी । सेवा करे सिद्ध चौरासी ॥

जो यह पढ़े गोरख चालीसा । होय सिद्ध साक्षी जगदीशा ॥

बारह पाठ पढ़े नित्य जोड़ी । मनोकामना पूर्ण होड़ी ॥

और श्रद्धा से रोट चढ़ावे । हाथ जोड़कर ध्यान लगावे ॥

सुने सुनावे प्रेम से अपने हाथ । मन इच्छित सब कामना पूरे गोरक्षनाथ ॥

अगम अगोचर नाथ तुम्हारा । पार ब्रह्म अवतार ॥

कानन कुंडल सिर जटा । अंग विभूति अपार ॥





सिद्ध पुरुष योगेश्वर । दो मुझको उपदेश ॥

हर समय सेवा करूं । सुबह शाम आदेश ॥



श्री नाथजी गुरुओं को आदेश। आदेश।।

(पुस्तक: श्री गुरु गोरक्षनाथ सिद्ध चालीसा)

लेखक श्री महंत गुरु डॉ. योगी विलास नाथ जी महाराज (के सौजन्य से)

अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा

अध्यक्ष: प्रचार प्रसार