ॐ

Navnath Pranali

(1)

आदिनाथ गुरु, सकल सिद्धों का। नाथ सिद्ध, गुरु शिष्य, परम तत्व का।।

आदिनाथ सोच, नाथ परंपरा। प्रकट करूं, समुच्य सर्व, जगजाहिरा।।

सत्य रूपी के, परम स्वरूप में। भय मुक्त, धूपन के, स्वयं रूप में।।

किया प्रकट तिन, महा आनंद सत्संग। ब्रह्म विष्णु, देव भय, बड़े उरचम में।।


(2)

आदिनाथ बड़े, दीन दयालु। ब्रह्म विष्णु, देव पर, भय कृपालु।।

भगवान विष्णु जी, तेज स्वरूपी। नाथ संतोष, नाम दिया, सत्य स्वरूपी।।

सत्य नाथ यहां, अति स्वरूपी। पथ वेद, शास्त्र पुराण, ज्ञान स्वरूपी।।

कहे आदिनाथ, होए तुम सिद्ध। पूजे जाओगे, युग युग में, नाथ प्रसिद्ध।।


(3)

हिम नगरी में, कैलाश धाम। आदि शक्ति, प्रातः प्रसंग, उत्तम स्नान।।

जटा सिंदूरी, सुमन बनावो। दीना अंगरख, धारणा को, रक्षक बनावो।।

बनखंडी हो, अघोर अवस्था। कहे ब्रह्मांड, आडम्बरी के, अंदर न जाओ।।

तब गुरु प्रसन्न, कृपा महेश। सारा अंधकार, काट दिया वह, उठ के शरीर।।


(4)

कहे पार्वती, पुत्र क्यूं मारिया। तब शिव शंकर ने, पार्वती को, उपाय बताया।।

गज काया के, श्रीनाथ आए। उनका जीवन, ईश्वर भोले, पुत्र बनाया।।2।।

नाम दिया उनका, गण कयास नाथ। किया पूजन, दीक्षा देकर, जगजाहिर किया।।

दिया वरदान, तुम होगे सिद्ध। कलियुग में, रहेंगे सिद्ध, नव नाथ के साथ।।


(5)

एक बारी, समुद्र मंथन। शिव ने किया, हलाहल, जहर पान।।

तब काया अनंत, वह हलचल रहा। चंद्र सूर्य को, धारण करके, तन गया प्राण।।

प्रसन्न होकर, दिया वरदान। हंसों अब दानी, युग युग में, नाथ सुजाण।।

भये शेष जी, अजयमे नाथ। बने चंद्रमा, वन्दपती स्वरूपी, चौसठी नाथ।।


(6)

एक बार शक्ति, करे उमंग। हे नाथ जी, देता हमको, गृहस्थतम ज्ञान।।

आदि नाथ जी, दृष्टि उरूपन। तब गये गिरि, निर्जन स्थान, समुद्र पार।।

अब यहां पार्वती, भये सनाथ। मिले उत्तम, महान, ज्ञान स्वरूपी।।

जब उठदाथ जी, निद्रा अधीन। समुद्र से, आये हुंकार, ज्ञान सुजाण।।


(7)

आदिनाथ खोजे, कौन हुंकार। तब मत्स्य गर्भ में, सुन रहे थे, बाल मत्स्येन्द्र।।

माया मत्स्येन्द्र, योग आदर्श। ज्ञान पथ के, तीन लोक में, अद्भुत प्रभाव।।

करके तपस्या, बने मत्स्येन्द्र। ले ली अवतार, शिव रूप में, दिव्य अवतार।।

आदिनाथ ने, दिया विचार। महा ज्ञान, योग कारण, लेंगे अवतार।।


(8)

हिमालय में, अलख निरंजन। वायु लोक में, बैठे आसन, ज्ञान भजन।।

वायु लोक के, अलख धनी। यही ज्ञान को, आदिनाथ के, दीये दान।।

तब आत्म स्वरूप, स्वयं स्वरूपी। अंतरकरण, ब्रह्म स्वरूप में, प्रगट हुई ज्योति।।

ज्योति में अब जन्मे, सुंदर बालक। नाथ गोरख, नाम धरे, स्वयं आदिनाथ।।


(9)

जती गोरख नाथ, ज्योति स्वरूपी। कर्ण कुंडल, नाद जटों में, महाज्ञान लीला।।

नाथ पंथ में, गोरख आदेश। ज्ञान ध्यान के, प्रसिद्ध, योग उपकार।।

कहे नाथ गुरु, जली राख वाला। साधु संत में, कोई नहीं, इनसे विलक्षण।।

नवनाथों में नाथ, नाथ श्री गोरख। देवी देवता, सुरतर, वीर, तीन लोक रक्षा।।


(10)

ऐसे नाथ बतलाए, भयो प्रमाण। योग ध्यान, ज्ञान रंजन, नाथ निरंजन।।

युगों युगों में, योग प्रचार। नाथ सिद्धों ने, वंदन किया, ज्ञान प्रसाद।।

नवनाथ से प्रकट, चौरासी सिद्ध। ज्ञान ध्यान और, योग याग में, जग प्रसिद्ध।।

नाथ कहे गुरु, शिष्य प्रणाली। नाथ सिद्ध ने, नाथ पंथ में, सिद्ध कर डाली।।






















[पुस्तक: ‘श्री नाथ सिद्ध पंथ’]

लेखक: श्री महंत गुरु डॉ. योग विलास नाथ जी महाराज (के सौजन्य से)

अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा

अध्यक्ष - प्रचार प्रसार